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12 फरवरी को है माघी पूर्णिमा और सत्यनारायण व्रत, जानिए इसके महत्व और कथा का संदेश

  • माघी पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण की कथा का पाठ करने की और व्रत-पूजा करने की भी परंपरा है।
  • कथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने और भगवान में आस्था बनाए रखने का संदेश देती है।
Maghi Purnima is on 12th February, Satyanarayan Katha Significance in hindi

माघी पूर्णिमा, जो इस बार बुधवार, 12 फरवरी को है, हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। इस दिन नदी स्नान, तीर्थ दर्शन, हवन-पूजन और दान-पुण्य जैसे शुभ कार्यों का विशेष महत्व होता है। साथ ही, इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने और व्रत रखने की परंपरा है, जो स्कंद पुराण में भी वर्णित है।

सत्यनारायण व्रत और इसका महत्व

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सत्यनारायण भगवान की कथा और व्रत करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पूर्णिमा तिथि को धर्म-कर्म का विशेष फल मिलता है, क्योंकि यह दिन सकारात्मक ऊर्जा और चंद्रमा के पूर्ण स्वरूप का प्रतीक है। ग्रंथों में कहा गया है कि पूर्णिमा पर किए गए शुभ कार्य अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं।

संक्षिप्त सत्यनारायण कथा

सत्यनारायण कथा पांच अध्यायों में विभाजित है, जिनमें सत्य, भक्ति और कर्म का महत्व बताया गया है:

  • पहला अध्याय: नारद मुनि और भगवान विष्णु के संवाद से प्रारंभ होता है, जहां नारद मुनि सत्यनारायण व्रत के लाभ पूछते हैं।
  • दूसरा अध्याय: एक गरीब ब्राह्मण की कहानी, जो व्रत करने के बाद सभी कष्टों से मुक्त हो गया।
  • तीसरा अध्याय: एक व्यापारी ने व्रत किया और धन-समृद्धि पाई, लेकिन नियमों को भूलने पर परेशानियों का सामना करना पड़ा।
  • चौथा अध्याय: एक राजा की कथा, जिसने भगवान की उपेक्षा की और उसका राजपाठ छिन गया। व्रत करने पर उसे अपना वैभव पुनः प्राप्त हुआ।
  • पांचवां अध्याय: निषाद पुत्र की कहानी, जिसने व्रत के माध्यम से अपना भाग्य बदल लिया।

कथा से जीवन प्रबंधन का संदेश

सत्यनारायण कथा हमें सत्य के मार्ग पर चलने और भगवान में आस्था बनाए रखने का संदेश देती है। यह बताती है कि झूठ और अधर्म के रास्ते से जीवन में परेशानियां बढ़ती हैं, जबकि सत्य और धर्म पर चलने से सफलता और शांति प्राप्त होती है।

सत्यनारायण व्रत की विधि

पूजन सामग्री: भगवान की मूर्ति या चित्र, पंचामृत, फल-फूल, तुलसी के पत्ते, हलवा-चूरमा, नारियल, केले, कुमकुम, धूप-दीप, कथा पुस्तक आदि।

विधि

  • स्नान के बाद पूजा स्थल को स्वच्छ करें और भगवान सत्यनारायण की मूर्ति स्थापित करें।
  • पंचामृत से अभिषेक करें, श्रृंगार करें और धूप-दीप जलाएं।
  • तुलसी के पत्तों के साथ भोग अर्पित करें और कथा का पाठ करें।
  • अंत में प्रसाद वितरण करें और परिवार के साथ पुण्य कार्यों में सहभागिता करें।
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