नीमली (अलवर)| राजस्थान, 26 फरवरी 2025 – 2024 को इतिहास में सबसे गर्म साल के रूप में दर्ज किया गया है। यूरोपीय संघ के कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, यह पहला कैलेंडर वर्ष था, जब वैश्विक औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया – जो औद्योगिक क्रांति से पहले (1850-1900) के औसत तापमान से स्पष्ट रूप से अधिक था।
स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरनमेंट 2025 रिपोर्ट के अनुसार, अगली पीढ़ी, जनरेशन अल्फा, एक बदले हुए जलवायु परिदृश्य के साथ बढ़ेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछली पीढ़ियों के लिए जलवायु परिवर्तन एक उभरता संकट था, लेकिन जनरेशन अल्फा के लिए यह एक नई वास्तविकता होगी। 2024 की वैश्विक औसत तापमान वृद्धि 1.60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई, जिससे यह साल जलवायु परिवर्तन के युग को स्पष्ट रूप से विभाजित करने वाला वर्ष बन गया।
अनिल अग्रवाल संवाद 2025 में रिपोर्ट जारी
यह रिपोर्ट राजस्थान के निमली में आयोजित अनिल अग्रवाल संवाद 2025 में जारी की गई, जहां भारत के जी20 शेरपा अमिताभ कांत, योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, प्रबंधन विशेषज्ञ राज लिबरहान, और सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने इसे संयुक्त रूप से प्रस्तुत किया। इस संवाद में देशभर के 80 से अधिक पत्रकारों और 20 से ज्यादा विशेषज्ञों ने पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा की।
क्या कहा विशेषज्ञों ने?
सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने कहा, “2025 की शुरुआत अच्छी और बुरी दोनों खबरें लेकर आई है। अच्छी खबर यह है कि पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। दिल्ली विधानसभा चुनावों में स्वच्छ हवा, स्वच्छ यमुना और कचरे की समस्या प्रमुख मुद्दे बने। सरकारें पर्यावरणीय कार्यक्रम लागू कर रही हैं, किसान अपने जल और मिट्टी को लेकर चिंतित हैं, और उद्योग भी संसाधनों की सुरक्षा चाहते हैं। लेकिन बुरी खबर यह है कि मौजूदा योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं, संस्थाएँ कमजोर हैं और पर्यावरण प्रबंधन की प्रक्रिया महंगी व गैर-समावेशी बनी हुई है।”
भारत के जी20 शेरपा अमिताभ कांत ने कहा कि यदि दुनिया के 50 सबसे प्रदूषित शहरों में से 42 भारत में हैं, तो यह नगर निगम प्रशासन की असफलता को दर्शाता है। उन्होंने सूरत और इंदौर जैसे शहरों के सफल मॉडल को अपनाने पर जोर दिया।
मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने जल उपयोग और औद्योगिक प्रदूषण के मुद्दों पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा, “जल संकट समय के साथ और बढ़ेगा। हमें इसे बचाने के लिए या तो राष्ट्रीयकरण और राशनिंग की नीति अपनानी होगी या फिर उचित मूल्य निर्धारण करना होगा। उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण में कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। ‘पोल्यूटर पे’ सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, चाहे वे छोटे हों या बड़े उद्योग।”
भारत में बढ़ते जलवायु आपदाओं का असर
सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में चरम मौसम घटनाएँ पहले की तुलना में अधिक और तीव्र थीं। वर्ष के पहले नौ महीनों में 255 दिन चरम मौसम घटनाएँ दर्ज की गईं, जबकि 2023 में यह आंकड़ा 235 और 2022 में 241 दिन था।
कृषि पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर प्रभाव पड़ा। 2024 में 3.2 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि जलवायु आपदाओं से प्रभावित हुई, जो 2022 की तुलना में 74% अधिक थी।
सीएसई की कार्यक्रम निदेशक किरण पांडेय ने कहा, “प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि के साथ वायुमंडलीय आर्द्रता स्तर 7% बढ़ जाता है। इससे जलवायु अस्थिरता और चरम मौसम की घटनाएँ बढ़ने की आशंका और बढ़ जाती है।”
क्या हो सकते हैं समाधान?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण, और प्रदूषण नियंत्रण पर बड़े और प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।