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राजस्थान का इतिहास हमारी धरोहर है, राजस्थानी भाषा हमारे प्राण है

— चळकोई फाउण्डेशन के हिस्ट्री टॉक कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा को लेकर संकल्प पारित
— विधानसभा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग, जिला कलक्टर जितेन्द्र सोनी, शिक्षाविद राजवीर सिंह चळकोई, इतिहासकार रीमा हूजा ने व्यक्त किए विचार

जयपुर: मानसरोवर स्थित एक ऑडिटोरियम में रविवार को चळकोई फाउंडेशन द्वारा ‘इतिहास पर चर्चा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में राजस्थान के इतिहास में कर्नल जेम्स टॉड के योगदान पर गहन चर्चा हुई। इसी दौरान राजस्थान विधानसभा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने राजस्थानी भाषा की मान्यता का मुददा भी पुरजोर तरीके से उठाया। इस आयोजन ने न सिर्फ कर्नल जेम्स टॉड के योगदान को याद किया, बल्कि राजस्थानी भाषा और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक नई ऊर्जा भर दी।

कर्नल जेम्स टॉड पर विस्तृत चर्चा
कार्यक्रम में राजस्थान की प्रख्यात इतिहासकार डॉ. रीमा हूजा ने कर्नल टॉड के जीवन और उनके द्वारा किए गए ऐतिहासिक कार्यों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि टॉड ने बिना किसी औपचारिक ऐतिहासिक प्रशिक्षण के बावजूद, राजस्थान के इतिहास को एक विशद और विलक्षण रूप में प्रस्तुत किया। डॉ. हूजा ने उनके योगदान को अनुकरणीय बताते हुए कहा कि टॉड ने राजस्थान की जनजातियों, पर्व-त्योहारों, परंपराओं, और शौर्यगाथाओं को कलमबद्ध कर एक अमूल्य धरोहर सहेजने का काम किया।

राजनीति और इतिहास पर विशेष संबोधन

राजस्थान विधानसभा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने अपने प्रभावशाली भाषण में कहा कि इतिहास को हमेशा तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन के बयान पर विरोध प्रकट करते हुए कहा कि वोट बैंक की राजनीति के लिए इतिहास का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। गर्ग ने राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए जन आंदोलन का आह्वान किया और नई पीढ़ी से इस प्रयास की बागडोर संभालने की अपील की। गर्ग ने कहा कि आप लोग भाषा का आन्दोलन तो खड़ा करो। मान्यता के लिए मिलकर लड़ेंगे। गर्ग ने साफ कहा कि जब तक आप अपने नेताओं को मजबूर नहीं करोगे, तब तक यह मुकम्मल नहीं होगा। उन्होंने वीरमदेव और कान्हड़देव सोनगरा जैसे वीर योद्धाओं के इतिहास पर शोध और लेखन की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

भाषा, संस्कृति और परंपराओं पर जोर

जयपुर के जिला कलेक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने अपने संबोधन में राजस्थानी भाषा और उसकी महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षण की जो व्यवस्था की गई है, वह अत्यंत सराहनीय है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा को भी एक आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। सोनी ने राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी भाषाई सुंदरता को सहेजने पर बल दिया।

राजस्थान नाम की ऐतिहासिक यात्रा

शिक्षाविद् राजवीर सिंह चळकोई ने कर्नल टॉड के जीवन से जुड़े कई रोचक प्रसंगों को साझा किया। उन्होंने बताया कि कर्नल टॉड पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ‘राजस्थान’ नाम का उपयोग इस प्रदेश के लिए किया। इससे पहले इसे ‘राजपूताना’ कहा जाता था। वर्ष 1949 में भारतीय संविधान लागू होने के बाद इस क्षेत्र का नाम आधिकारिक रूप से ‘राजस्थान’ कर दिया गया, जो टॉड द्वारा दिए गए नाम से प्रेरित था। चळकोई ने यह भी बताया कि टॉड ने राजस्थान के तत्कालीन समाज, जनजातियों और परंपराओं पर जो लेखन किया, वह आज भी अनूठा और प्रासंगिक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राणा सांगा पर की गई एक हालिया टिप्पणी ऐतिहासिक तथ्यों से परे है, और इसके पीछे दौलत खान और आलम खान द्वारा बाबर को भारत बुलाने की भूमिका थी।

कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुति और श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के दौरान राजस्थान विधानसभा के मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने राजस्थानी गीत ‘बैठो हूं आ तेवड़ ने, अंधारो आवण नीं दूंला’ की प्रस्तुति ने माहौल को ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।

चळकोई फाउंडेशन के प्रवक्ता लोकेन्द्र सिंह किलाणौत ने बताया कि यह आयोजन शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान दिवस पर प्रारंभ किया गया है और यह ‘हिस्ट्री टॉक’ के रूप में आगे भी जारी रहेगा। शहीदों को श्रद्धांजलि स्वरूप दो मिनट का मौन रखा गया और सभी वक्ताओं को कलम भेंट कर ‘शब्द क्रांति’ की मशाल को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया गया। कार्यक्रम में राजस्थान दिवस का आयोजन विक्रमी संवत कैलेण्डर के अनुसार किए जाने पर फाउण्डेशन की ओर से सरकार का आभार प्रकट किया गया।

प्रमुख अतिथि और प्रतिभागी

इस ऐतिहासिक चर्चा में भवानी निकेतन के युवराज सिंह, मन की खुशी फाउंडेशन की निदेशक पायल चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार डॉ. क्षिप्रा माथुर, प्रशासनिक अधिकारी अरविंद सिंह, राजस्थान विश्वविद्यालय के महासचिव अरविन्द जाजड़ा, छात्र नेता शुभम रेवाड़, बीकानेर के शिक्षाविद एस.एन. जोशी, जालोर से भवानी सिंह धांधिया, जोधपुर से मरुधर कंवर, शिक्षाविद सम्पत सिंह देवल, कवि छैलू चारण छैल समेत बड़ी संख्या में विभिन्न विश्वविद्यालयों के इतिहास विषय के शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

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