दस साल भोपाजी के शरण में रही सिरोही भाजपा को अब लोढ़ा ने नाचने को कर दिया मजबूर

दस साल भोपाजी के शरण में रही सिरोही भाजपा को अब लोढ़ा ने नाचने को कर दिया मजबूर

दस साल भोपाजी के शरण में रही सिरोही भाजपा को अब लोढ़ा ने नाचने को कर दिया मजबूर
दस साल भोपाजी के शरण में रही सिरोही भाजपा को अब लोढ़ा ने नाचने को कर दिया मजबूर

गणपतसिंह मांडोली/फर्स्ट राजस्थान @ सिरोही
जिस प्रकार से गायकी की दुनिया में #लता मंगेश्कर, हॉकी में #ध्यानचंद और कुश्ती में #दारासिंह का नाम ही काफी है, ठीक उसी प्रकार के हालात इन दिनों सिरोही में हो रखे है। यहां लगातार दस साल से भोपाजी (पूर्व मंत्री ओटाराम देवासी ) के शरण में राज कर रही भाजपा को तीतर बितर करने के लिए संयम लोढ़ा नाम ही काफी है। जब से दस साल का वनवास पूरा करके संयम लोढ़ा सत्ता में लौटे हैं, तब से ही दस साल से एकजुटता का रंग दिखाने वाली भाजपा के चेहरे फीके से नजर आने लगे है। चुनावों में हार ही नहीं बल्कि संगठन में भी बिखराव शुरू हो गया है। जो हालात दस साल पहले थे, ठीक उसी दशा में सिरोही भाजपा लौट चुकी है। सोमवार को जिलाध्यक्ष पद की प्रक्रिया के दौरान हुआ हंगामा सिरोही भाजपा की अंदरूनी कलह का स्पष्ट संकेत दे रहा है। हालात यही रहे तो जिले की कमान संभालने वाले नेता के लिए जिले में भाजपा को पुनः संगठित करना मुश्किल भी हो सकता है।

आइये बताते है किस तरह भाजपा मजबूत हुई और अब बिखराव कैसे…
वर्ष 1990 से लेकर 1998 तक भैरोसिंह शेखावत की सरकार के दौरान सिरोही विधानसभा से तारा भंडारी विधायक थी, वे पार्टी में सशक्त लीडर थी। उस अवधि में विधानसभा उपाध्यक्ष पद पर सुशोभित होने का भी अवसर मिला, इस दौरान सिरोही कांग्रेस में लीडरशिप की एक कमी झलक रही थी, लेकिन एक युवा नेता का नेतृत्व सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था, उसका नाम था संयम लोढ़ा। कानून की पढ़ाई औऱ पत्रकारिता का अनुभव होने के साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ की समझ के कारण पार्टी शीर्ष नेतृत्व की नजर उन पर पड़ी और वर्ष 1998 में विधानसभा चुनाव में सिरोही से संयम लोढा को पार्टी ने टिकट थमा दी। बस क्या था एक युवा जुनून के सामने अनुभवी भाजपा प्रत्याशी तारा भंडारी चुनाव हार गई। सिरोही में कांग्रेस के एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई।

sanyam lodha

विधानसभा सत्रों में सरकार के बावजूद सवाल खड़े करने और विधानसभा में जिले की बखूबी पैरवी करने के कारण जिले में कांग्रेस के बड़े नेता के रूप में संयम लोढ़ा स्थापित हो गए। वर्ष 2003 में वसुंधरा राजे की परिवर्तन यात्रा में प्रदेश में कांग्रेस सरकार तो उखड़ गई, लेकिन सिरोही से लगातार दूसरी बार संयम लोढ़ा विजयी होने में कामयाब रहे। प्रदेश में विपरीत सरकार होने के कारण संयम लोढा के सवाल भी बड़े तीखे होते, जो हमेशा चर्चा का विषय बनते रहे। जिले में संयम लोढ़ा एक स्थापित नेता हो गए, जिनके बिना पूछे पत्ता भी नहीं हिलता, विधानसभा में राजे को सवालों से तंग करके कई बार चर्चा में भी रहे, इस अवधि में सिरोही में भाजपा एक प्रकार से बिखर चुकी थी। हालांकि यहां पर विनोद परसरामपुरिया के रूप में भाजपा को एक मजबूत नेतृत्वकर्ता तो मिल चुका था, जो संगठन को एकजुट करने में कुछ सफल भी हुए, लेकिन जातीय समीकरणों के लिहाज से यहां कोई जिताऊ चेहरा नजर नहीं आ रहा था। 1998 से लेकर 2008 तक के कार्यकाल में लोढ़ा इतने मजबूत हो गए कि भाजपा के पास स्थानीय कोई विकल्प भी नहीं दिख रहा था। ऐसी स्थिति में वसुंधरा राजे ने राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल करते हुए एक दांव खेला। उन्होंने मुंडारा (पाली) चामुंडा माता मंदिर के पुजारी ओटाराम देवासी (भोपाजी) को सिरोही विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट थमा दी, हालांकि शुरुआत में स्थानीय नहीं होने के कारण कुछ विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन अंत में भोपाजी के पक्ष में पार्टी एकजुट हुई और लोढा के विजयी रथ को रोकने में कामयाब हो गए। यहां से सिरोही में भाजपा की बहार शुरू हो गई। इसके बाद लगातार दूसरी बार 2013 में भोपाजी भारी बहुमत से जीत गए। बस क्या था, सिरोही भाजपा का मतलब ही भोपाजी से शुरू होने लगा। भाजपा के कदावर नेता बन चुके थे भोपाजी, निकाय से लेकर पंचायत राज चुनाव तक सभी जीत लिए। सिरोही जिले में भाजपा इतनी मजबूत हो गई कि कांग्रेस ने तो अनुमान लगाना ही बन्द कर दिया, संयम लोढा भी दस साल के वनवास से परेशान हो गए थे। कांग्रेस में भी उनके विरुद्ध लॉबी तैयार हो चुकी थी, निराशा का भाव भी चेहरे से स्पष्ट झलकने लग चुका था, लेकिन कहते है न कि अनुभव हमेशा खोटा नहीं जाता। ऐसा ही संयम लोढ़ा ने अनुभव का इस्तेमाल किया। जैसे ही कांग्रेस ने 2018 में लोढ़ा की टिकट काटी, लोढ़ा ने आव देखा न ताव, कूद पड़े निर्दलीय मैदान में। निर्दलीय से दो फायदे थे, एक भोपाजी के विरुद्ध दस साल की एंटी इनकमबेंसी और संयम लोढ़ा के दस साल के वनवास की सहानुभूति। अंत में हुआ भी कुछ ऐसा ही। निर्दलीय लड़े संयम लोढा और भाजपा के भोपाजी के बीच मुकाबला हुआ। कांग्रेस तो जमानत भी नहीं बचा पाई, परिणाम लोढ़ा के पक्ष में रहे और वे इतिहास को समेटते और बिखेरते हुए तीसरी बार विधायक बनने में कामयाब हो गए, हालांकि ये निर्दलीय थे, लेकिन सरकार का संरक्षण होने के कारण मूल कांग्रेस की पैरवी ही करते है। अब सिरोही जिले में फिर से इन्हीं से कांग्रेस की शुरुआत होती है। जिस प्रकार के दस साल में भोपाजी के कार्यकाल में भाजपा ने मजबूती पाई थी, वो फिर से बिखरती नजर आ रही है। निकाय चुनाव में बुरी तरह से हार और अब अध्यक्ष पद चुनाव के दौरान प्रभारी से झगड़ा तो यही संकेत दे रहा है।

सिरोही भाजपा को सशक्त लीडर की जरूरत
सिरोही जिले में चुनावी समीकरणों के लिहाज से भाजपा के लिए ओटाराम देवासी एक मजबूत नेता रहे, अब उनकी गैर मौजूदगी में जिले में एक ऐसे नेता की जरूरत है जो संयम लोढ़ा जैसे नेता का मुकाबला कर सके। मौजूदा समय में इतने सशक्त नेता का चयन कठिन बना हुआ है। संगठन को एकजुट रखने के लिए जानकार, प्रवक्ता और सहनशीलता रखने वाले नेतृत्व की आवश्यकता देखी जा रही है। सिरोही जिले में कदावर नेता के रूप में वीरेंद्र सिंह चौहान, कमलेश दवे, लुम्भाराम चौधरी, सुनील व्यास, नारायण पुरोहित, अरुण ओझा, पायल परसरामपुरिया, अशोक पुरोहित जैसे नेता भी है। इनके अलावा युवा नेता हेमन्त पुरोहित का भी नाम है, अब देखना होगा पार्टी किसके नाम पर मुहर लगाती है.

https://youtu.be/Xp9IrY8_Rx0