बीते ज़माने में तिलोड़ा के सघन वन में शिकार करने गए ठाकुर की श्वान ने बचाई थी जान, अब वहीं होती है श्वान की पूजा

बीते ज़माने में तिलोड़ा के सघन वन में शिकार करने गए ठाकुर की श्वान ने बचाई थी जान, अब वहीं होती है श्वान की पूजा

  • वफ़ादारी की तीमारदारी

रिपोर्ट - देवीसिंह राठौड़, तिलोड़ा

आज के इस स्पुतनिक युग में किसी मृत परिजन का स्मारक बनाया जाना कल्पना से परे लगता है, तब किसी श्वान का स्मारक बनाया जाना कल्पनातीत ही प्रतीत होता है। लेकिन, तिलोड़ा गांव के जालोर-बागोड़ा मुख्य सड़क मार्ग के समीप वाचलड़ाई नामक तालाब के पास हुतात्मा श्वान का स्मारक विद्यमान है और जिसकी बाक़ायदा पूजा-अर्चना भी की जाती है । यह कोई कपोल कल्पना भर नहीं अपितु ठोस वास्तविकता है ।

कहते हैं कि एक ज़माने में तिलोड़ा का वाचलड़ाई परिक्षेत्र सघन अरण्य (वन क्षेत्र) था । इसकी सघनता का अनुमान इस बात से सहज ही लगाया जा सकता है कि भानु की रश्मियां भी मंजरियों से लिपटे वृक्षों की पत्तियों पर छिटक-बिखर जाती थीं। धरती की सतह तक पहुंच ही नहीं पाती थीं। यहां दिन के उजियारे में भी घुप्प अंधियारे की स्याह चादर तनी रहती थी ।

यह अरण्य विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों की शरणस्थली हुआ करता था। यहां जंगली सूअर, बघेरों जैसे हिंसक प्रवृत्ति के जानवर भी बहुतायत में पाए जाते थे। यहां दूर-दराज़ के शिक़ारी आखेट ( शिक़ार) के लिए आते थे। उस ज़माने में घात लगाकर निरीह प्राणियों की की गई हत्या को शिक़ार करना नहीं माना जाता था। शिक़ारी अपने जैसे अथवा अपने से अधिक शक्तिशाली ख़ूंख़ार हिंसक पशु यथा शेर, बघेरों, जंगली सूअर आदि का शिक़ार किया करते थे। आमने-सामने की भिडंत। शिक़ार करते थे अथवा ख़ुद शिक़ार बन जाते थे। बग़ैर शिक़ार किए भी नहीं लौटते थे। चाहे कितनी ही समयावधि गुज़र जाए या फिर प्राण ही क्यों न निकल जाएं। इसीलिए, शिक़ार कर लौटे शिक़ारी अथवा शिक़ारियों का विवाह कर लौटे दूल्हे की मानिन्द गाजे-बाजे, ढोल-ढमाकों के साथ स्वागत किया जाता था।

निकटवर्ती बाड़मेर ज़िले के भाखरपुरा गांव से तत्कालीन ठाकुर स्वर्गीय खंगार सिंह जी राठौड़ अपने दल-बल के साथ यहां आखेट के लिए आए थे। उनके साथ कई प्रशिक्षित एवं पालतू शिक़ारी श्वान भी थे। शिक़ार के दौरान वाचलड़ाई परिक्षेत्र के इस सघन अरण्य में उनके सहयोगी बिछड़ गए थे। इसी बीच, ठाकुर खंगार सिंह जी राठौड़ और एक जंगली सूअर की भिडंत हो गई। सूअर बेहद ख़तरनाक़ था। बुरी तरह से ज़ख़्मी होने के बाद वह बुरी तरह से बिफ़र गया। उसने ठाकुर खंगार सिंह जी राठौड़ पर प्राणघातक हमला कर दिया। उनके स्वामीभक्त श्वान ने अपने प्राणों पर खेल कर उस हिंसक जंगली सूअर से उनकी जान बचाई, लेकिन स्वयं श्वान मर गया। जब श्वान और सूअर आपस में गुत्थमगुत्था हुए, तब ठाकुर खंगार सिंह जी राठौड़ ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए उस सूअर का शिक़ार कर लिया।

चूंकि, श्वान मर चुका था और शिक़ारी ठाकुर खंगार सिंह जी राठौड़ इसे सामान्य घटना समझते हुए उसके मृत शरीर को यहीं छोड़कर अपने गांव भाखरपुरा चले गए। कालांतर में उनके वंशजों को आर्थिक, शारीरिक एवं पारिवारिक कठिनाइयों के चलते किसी तांत्रिक (भोपे) ने समस्या के समाधान के लिए हुतात्मा श्वान के बलिदान स्थल पर स्मारक बनाकर, वर्ष में एक बार सपरिवार पूजा-अर्चना की सलाह दी। समस्या का समाधान होने पर शिक़ारी के वंशजों ने ऐसा ही किया और वर्ष में एक बार नियत दिन इस स्मारक पर आकर हुतात्मा श्वान की पूजा-अर्चना करते हैं। बागोड़ा क्षेत्र में किसी कार्यवश आने पर इस परिवार के लोग तिलोड़ा स्थित श्वान स्मारक पर मत्था टेकने अवश्य आते हैं।

इस स्मारक के निकट स्थित बुआला भील बस्ती के लोग सुबह-शाम कुतरा जी बावची की नियमित पूजा-अर्चना करते है। राहगीर शीश नवाते हैं एवं वाहन चालक अपने वाहनों के भोंपू बजाकर कुतरा जी बावची का अभिवादन करते हैं।