बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में हालिया बदलाव और पाकिस्तान से बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए एक नई चिंता का कारण बन रही हैं। शेख़ हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग पार्टी के सत्ता से बेदखल होने के बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक नई दिशा देखने को मिली है। पाकिस्तान के साथ बढ़ते सैन्य और व्यापारिक सहयोग के संकेत, भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों पर प्रभाव डाल सकते हैं।
इतिहास की पुनरावृत्ति या नई शुरुआत?
बांग्लादेश, जिसे पहले पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था, 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर स्वतंत्र देश बना था। शेख़ हसीना और उनकी अवामी लीग पार्टी के शासनकाल में बांग्लादेश ने हमेशा पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को सख्त बनाए रखा। इसके विपरीत, जब ख़ालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी सत्ता में आती थी, तब पाकिस्तान से बांग्लादेश के संबंधों में सुधार होता था। इस बार, जब दोनों प्रमुख पार्टियाँ सत्ता से बाहर हैं, तो बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जो मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में काम कर रही है, पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के प्रयासों में जुटी हुई है।
सैन्य सहयोग और व्यापारिक संबंधों की नई दिशा
पिछले कुछ महीनों में, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच उच्चस्तरीय सैन्य और व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों की मुलाकातें हुई हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद युनूस के बीच दो बार मुलाकातें हो चुकी हैं। इसके अलावा, बांग्लादेश के प्रमुख सैन्य अधिकारी जनरल एसएम कमरुल हसन ने जनवरी में पाकिस्तान का दौरा किया और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर से मुलाकात की।
हाल ही में पाकिस्तान के प्रमुख व्यापारिक निकाय, फेडरेशन ऑफ पाकिस्तान चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ का एक प्रतिनिधिमंडल बांग्लादेश गया था। इस दौरे में, दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। पाकिस्तान ने बांग्लादेश से मुक्त व्यापार समझौते की अपील की है और बांग्लादेश ने 50 हज़ार टन चावल और 25 हज़ार टन चीनी के आयात का आदेश दिया है। इस व्यापार समझौते से पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार में भारी वृद्धि की उम्मीद है, जो अगले कुछ वर्षों में तीन अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
सैन्य सहयोग में गहरी नजदीकी
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग की बात भी सामने आ रही है। पाकिस्तान ने बांग्लादेश को जेएफ-17 लड़ाकू विमान देने पर विचार किया है, जो भारत के लिए एक चिंता का विषय बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच सैन्य सहयोग बढ़ने से भारत की सामरिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। नजम सेठी जैसे पाकिस्तानी विश्लेषक ने इस बढ़ते सैन्य सहयोग को भारत के लिए बड़ा झटका बताया है, क्योंकि भारत ने बांग्लादेश में काफी निवेश किया है और ऐसे में पाकिस्तान से संबंधों की मजबूती भारत के लिए चिंताजनक हो सकती है।
भारत की प्रतिक्रिया: एक नई रणनीति की जरूरत?
भारत के पूर्व उच्चायुक्त, अब्दुल बासित ने इस बढ़ते सहयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि बांग्लादेश के लोगों के बारे में यह धारणा बनाई गई थी कि वे पाकिस्तान के विरोधी हैं, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। बांग्लादेश में पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति बढ़ रही है, और यह भारत के लिए एक नए भू-राजनीतिक चुनौती का संकेत है। बासित ने यह भी कहा कि भारत ने हाल ही में तालिबान से भी संबंध मजबूत करने की कोशिश की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत भी अपनी रणनीति में बदलाव ला रहा है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्ते: एक नई वास्तविकता
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ते संबंधों को लेकर कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह बांग्लादेश की एक नई विदेश नीति का हिस्सा हो सकता है। प्रोफेसर हर्ष पंत, जो थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में कार्यरत हैं, का कहना है कि बांग्लादेश को यह निर्णय लेना होगा कि वह अपनी विदेश नीति की दिशा किस ओर मोड़ना चाहता है। यदि बांग्लादेश पाकिस्तान से अपनी मित्रता बढ़ाता है, तो भारत के लिए इससे परेशानियाँ बढ़ सकती हैं, लेकिन शेख़ हसीना के शासन के दौरान बांग्लादेश ने पहले भी चीन के साथ सैन्य सहयोग को बढ़ाया था। ऐसे में बांग्लादेश का पाकिस्तान से संबंध बढ़ाना कोई असामान्य कदम नहीं होगा।
भारत की रणनीतिक चुप्पी
भारत के लिए यह स्थिति और भी जटिल होती जा रही है, क्योंकि बांग्लादेश के वर्तमान नेतृत्व ने पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाने का रुख अपनाया है। शेख़ मुजीब-उर रहमान, जो बांग्लादेश के संस्थापक थे, पाकिस्तान के खिलाफ थे, लेकिन समय के साथ पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों में सुधार हुआ। अब, बांग्लादेश का पाकिस्तान के साथ संबंधों को फिर से मजबूत करना भारत के लिए एक नई चुनौती प्रस्तुत करता है।
बांग्लादेश और पाकिस्तान के बढ़ते सैन्य और व्यापारिक संबंधों को लेकर भारत की चिंताएँ स्वाभाविक हैं। बांग्लादेश का पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते मजबूत करना न केवल भारत के लिए एक सामरिक चुनौती है, बल्कि यह क्षेत्रीय राजनीति में भी नई उथल-पुथल का कारण बन सकता है। भारत को इस बदलती स्थिति से निपटने के लिए अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित करना होगा, ताकि वह क्षेत्रीय सुरक्षा और अपने सामरिक हितों की रक्षा कर सके।