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आचार्य रत्नसेन की निश्रा में आरंभ हुआ ओली तप, तप के माध्यम से काया की ममता छोड़ आत्मकल्याण की सीख

  • पंकूबाई भूरमल जैन परिवार की ओर से इस आयोजन की शुरुआत गुरुवार को साधु-संतों के नगर प्रवेश के साथ हुई।
  • आचार्य रत्नसेन सुरिश्वर की निश्रा में करीब 1000 साधक तपस्या कर रहे हैं, जिनके लिए 80 टेंट लगाए गए हैं।
  • प्रवचनों में आत्मसंयम, काया की ममता से मुक्ति और कर्मबंधन से मुक्ति पर विशेष बल दिया गया।
Bada Gaon Oli Tap Festival in Rajasthan | बडगांव में ओली तप महोत्सव की झलक

शिवगंज के समीपवर्ती बडगांव में इन दिनों अध्यात्म और आत्मसंयम का विशेष वातावरण देखने को मिल रहा है। यहां पंकूबाई भूरमल जैन परिवार की ओर से नौ दिवसीय ओली तप महोत्सव का आयोजन किया गया है, जिसमें गोडवाड क्षेत्र से आए एक हजार से अधिक साधक तपस्या में लीन हैं। कार्यक्रम का मार्गदर्शन आध्यात्मिक विचारक रत्नसेन सुरिश्वरजी की निश्रा में हो रहा है।

आचार्य ने अपने उद्घाटन प्रवचन में कहा कि जीवन की स्थायी शांति और आत्मकल्याण के लिए तप आवश्यक है। उन्होंने बताया कि तप दो प्रकार के होते हैं—बाह्य तप और अभ्यंतर तप। बाह्य तप में भोजन, सुख-सुविधा और शारीरिक आनंद का त्याग होता है, जिससे काया कृश होती है। इसका उद्देश्य अंतर्मन की तपस्या को मजबूत करना है।

उन्होंने आगे कहा कि “जब कोई व्यक्ति हमें दुख दे और हम फिर भी उसके प्रति द्वेष न रखें, तो वही असली शौर्य है।” आचार्य ने जीवन की सार्थकता को तप धर्म की साधना से जोड़ते हुए आत्मा को कर्म के बंधनों से मुक्त करने की प्रेरणा दी।

इस आयोजन में सभी आयु वर्ग के लोग भाग ले रहे हैं, जिससे यह धार्मिक आयोजन सामाजिक सहभागिता का भी उदाहरण बन गया है।

भक्ति और अनुशासन का दृश्य, 80 टेंटों में आराधना में लीन साधक

इस तप महोत्सव के लिए आयोजकों ने लगभग 80 टेंटों की व्यवस्था की है, जहां साधक नियमानुसार तपस्या कर रहे हैं। नगर में साधु-संतों के नगर प्रवेश से इसकी भव्य शुरुआत हुई, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए। यह आयोजन न केवल धार्मिक साधना का केंद्र बना है, बल्कि समाज में संयम, अनुशासन और आत्मानुशासन का संदेश भी प्रसारित कर रहा है।

शत्रुंजय तीर्थ पर आधारित पुस्तक का होगा विमोचन

शनिवार की दोपहर को महोत्सव स्थल पर एक विशेष आयोजन होगा, जिसमें शत्रुंजय भाव यात्रा नामक पुस्तक का विमोचन किया जाएगा। यह ग्रंथ आचार्य रत्नसेन सुरिश्वरजी द्वारा लिखी गई 253वीं पुस्तक है। इसमें जैन धर्म के प्रमुख तीर्थ शत्रुंजय की महिमा, आध्यात्मिक गूढ़ता और तीर्थ यात्रा के भावों का गहन वर्णन किया गया है।

धार्मिक आयोजन में दिखा सामाजिक एकता का स्वरूप

इस महोत्सव के माध्यम से धार्मिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक समरसता का भी संदेश दिया जा रहा है। आयोजन में सभी आयु वर्ग के लोग भाग ले रहे हैं, जिससे यह धार्मिक आयोजन सामाजिक सहभागिता का भी उदाहरण बन गया है।

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