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राजस्थान में होलिका दहन: कब और कैसे होगा शुभ मुहूर्त में?

  • भद्रा काल: 13 मार्च 2025 को पूरे दिन भद्रा का साया रहेगा, जिसके कारण होलिका दहन प्रदोष काल में नहीं बल्कि देर रात किया जाएगा।
  • शुभ मुहूर्त: होलिका दहन का समय रात 11:21 बजे से मध्य रात्रि 12:28 बजे तक रहेगा।
  • पूजा विधि: लकड़ियों का ढेर, नारियल, भुट्टे, अक्षत, और गुलाल के साथ होलिका की परिक्रमा की जाती है।
  • दुर्लभ संयोग: 30 साल बाद कुंभ राशि में सूर्य, बुध और शनि की स्थिति के कारण विशेष खगोलीय संयोग बन रहा है।
  • पौराणिक कथा: होलिका दहन अच्छाई पर बुराई की जीत का प्रतीक है, जो हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा से जुड़ा
Holika Dahan 2025: शुभ मुहूर्त और पूजा विधि की जानकारी

राजस्थान समेत पूरे देश में होली का पर्व हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन का दिन विशेष खगोलीय घटनाओं और दुर्लभ संयोगों के कारण और भी खास बन गया है। यदि आप होलिका दहन के समय और विधि को लेकर भ्रमित हैं, तो यह लेख आपके लिए है।

होलिका दहन आमतौर पर प्रदोष काल में किया जाता है, लेकिन इस साल भद्रा के प्रभाव के कारण इसका समय बदल गया है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, 13 मार्च 2025 को रात 11:21 बजे से मध्य रात्रि 12:28 बजे तक होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रहेगा।

होलिका दहन की विधि

होलिका दहन के लिए लकड़ियों का ढेर तैयार किया जाता है, जिसमें नारियल, भुट्टे, अक्षत, गुलाल, कंडे, पुष्प, गेहूं की बालियां और बताशे डाले जाते हैं। पूजा में होलिका पर रोली बांधकर उसकी परिक्रमा की जाती है। इसके बाद लकड़ियों में आग लगाई जाती है।

जलती हुई होलिका की परिक्रमा करते हुए लोग अपने परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

30 साल बाद बन रहा दुर्लभ संयोग

इस वर्ष होलिका दहन पर गुरुवार के दिन सूर्य, बुध और शनि के कुंभ राशि में होने के कारण एक विशेष खगोलीय संयोग बन रहा है। यह संयोग आखिरी बार 1995 में बना था। ज्योतिषीय दृष्टि से यह दिन तंत्र साधना के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

हालांकि, इस दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक मान्य नहीं होगा। इसके बावजूद, होली का पर्व परंपरा और उत्साह के साथ राजस्थान में मनाया जाएगा।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

होलिका दहन की कहानी हिरण्यकश्यप, उसकी बहन होलिका और भक्त प्रह्लाद से जुड़ी है। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका की मदद ली, जिसे आग में न जलने का वरदान था। लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई।

इस घटना को अच्छाई की बुराई पर जीत के रूप में देखा जाता है और तभी से हर साल होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।

अगले दिन धुलेंडी का रंगों भरा उल्लास

होलिका दहन के अगले दिन धुलेंडी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर रंग-गुलाल लगाते हैं, गाने-बजाने और नाचने का दौर चलता है। माना जाता है कि यह दिन गिले-शिकवे भूलकर रिश्तों को फिर से मजबूत करने का अवसर है।

धुलेंडी का उत्साह सुबह से लेकर दोपहर तक चलता है। इसके बाद लोग नहाकर नए कपड़े पहनते हैं और मिठाइयों के साथ अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं।

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