- आदिवासी गरासिया समाज में होली का पर्व उत्साह और उमंग से मनाया जाता है, जहां होलिका दहन में शुभ मुहूर्त देखने के बजाय चंद्रमा की सीध पर ध्यान दिया जाता है।
- परंपरागत परिधान पहनकर ढोल की धुन पर गीत और नृत्य करते हुए लोग होलिका स्थल तक पहुंचते हैं।

सिरोही: राजस्थान के आदिवासी गरासिया समाज में होली का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और उत्साह के साथ मनाया जाता है। दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों में बसे ये लोग आज भी अपनी पुरातन संस्कृति को जीवित रखते हुए होलिका दहन और होली खेलने की अनोखी परंपरा निभा रहे हैं। आबूरोड ब्लॉक के भाखर और अन्य आदिवासी क्षेत्रों में होली की धूम ने माहौल को उत्सवमय बना दिया है।
हफ्तेभर पहले शुरू हो जाती है तैयारियां
होली के प्रति आदिवासी समाज की खुशी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पर्व से सात दिन पहले ही गांवों में परंपरागत परिधानों में पुरुष और महिलाएं ढोल की थाप पर नृत्य करते और होली गीत गाते नजर आते हैं। यह दृश्य हर किसी को आकर्षित करता है।
होलिका दहन की अनोखी परंपरा
आदिवासी समाज के प्रमुख रामलाल रणोरा बताते हैं कि होलिका दहन के दिन गांव के सभी लोग लकड़ी लेकर दहन स्थल पर पहुंचते हैं। पंच पटेल नारियल अर्पित कर होली जलाते हैं। इस दौरान सात तरह के अनाज लेकर होलिका की परिक्रमा की जाती है। नवविवाहित जोड़े थाल लेकर आते हैं, जिसका भोग लगाकर प्रसाद बांटा जाता है।
पूरी होली जलने के बाद उपवासधारी लोग देवी-देवताओं की वेशभूषा धारण कर धधकते अंगारों से गुजरते हैं और उपवास तोड़ते हैं। अगले दिन परंपरागत नृत्य और पलास के फूलों से तैयार रंग से होली खेली जाती है।
ढोल और नृत्य का अनूठा संगम
समाज के धर्माराम गरासिया के अनुसार, होली के दौरान बजाए जाने वाले ढोल की धुनें अलग-अलग होती हैं। होलिका दहन, गेरिया नृत्य, बाबा नृत्य और ज्वार नृत्य के समय ढोल की धुन बदल जाती है। अगर धुन सही नहीं हो तो लोग गीत और नृत्य रोक देते हैं।
पसंदीदा व्यंजन: चूरमा और मालपुआ
सांकलाराम गरासिया बताते हैं कि होली पर समाज के हर घर में चूरमा और मालपुआ बनाया जाता है। ये पारंपरिक मिठाइयां पर्व के उत्साह को और बढ़ा देती हैं। हालांकि, बदलते समय के साथ बाजार से मिठाइयां खरीदने की परंपरा भी जुड़ गई है।
होलिका के बीज और फसल की मान्यता
आदिवासी मान्यता है कि होलिका पूजन में उपयोग किए गए अनाज के बीज खेतों में बोने से अच्छी फसल होती है। इन बीजों को बारिश के मौसम में अन्य बीजों के साथ रोपित किया जाता है।
चंद्रमा की सीध पर होता है दहन
आदिवासी समाज शुभ मुहूर्त के बजाय चंद्रमा की स्थिति के आधार पर होलिका दहन करते हैं। जब चंद्रमा सिर के ठीक ऊपर हो और लोगों की परछाई गायब हो जाए, तभी होलिका दहन किया जाता है।
इस परंपरागत और अनोखे उत्सव के माध्यम से आदिवासी समाज न केवल अपनी संस्कृति को जीवंत रखे हुए है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी धरोहर सौंप रहा है।