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कांस्टेबल करण मीणा पर इतनी मेहरबानी क्यों? गंभीर आरोपों के बावजूद सिर्फ विभागीय जांच, पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

  • कांस्टेबल करण मीणा पर शराब दुकान से मुफ्त शराब लेने और अन्य अनुशासनहीनता के गंभीर आरोप।
  • पीड़ित पक्ष ने एसपी कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई, जांच रेवदर डिप्टी को सौंपी गई।
  • कांस्टेबल पर जबरन युवकों को शराब पिलाने और थाने ले जाकर मारपीट करने के आरोप।
Police Constable Accused of Misconduct in Sirohi | सिरोही में कांस्टेबल पर लगे गंभीर आरोप

शराब दुकान पर पुलिसकर्मी होने की धौंस दिखाकर मुफ्त में शराब की बोतल लेने, ठेके के बाहर दोस्तों के साथ जाम छलकाने, कुछ युवकों को जबरन शराब पिलाने और बेवजह थाने ले जाकर गाली-गलौच व मारपीट करने के मामले में कांस्टेबल करण मीणा पर कार्रवाई के नाम पर केवल विभागीय जांच बिठाकर इतिश्री कर देना जिलेभर में चर्चा का विषय बन गया है।

पूरे मामले को लेकर पीड़ित पक्ष शिवसिंह व पुरणसिंह निवासी पुनक ने एसपी कार्यालय पहुंचकर शिकायत पत्र भी दिया था, जिसके बाद कार्यवाहक एसपी देवाराम ने कांस्टेबल करण मीणा के खिलाफ रेवदर डिप्टी को जांच के आदेश दिए थे।

सुलगते सवाल जो मांग रहे जवाब

वीडियो में कांस्टेबल की करतूत साफ-साफ दिख रही है!

वीडियो में साफ तौर पर कांस्टेबल करण मीणा शराब दुकान पर किसी को फोन लगाकर अपना परिचय “करण मीणा, बीट कांस्टेबल” के रूप में दे रहा है और एक शराब की बोतल दिलवाने की बात कह रहा है। सामने वाला व्यक्ति कांस्टेबल से सेल्समैन को फोन देने के लिए कहता है, जिसके बाद सेल्समैन को ऐसा कुछ कहा जाता है कि वह कांस्टेबल को शराब की बोतल दे देता है।

अवैध शराब बिक्री पर नकेल कौन कसेगा?

आबकारी विभाग के साथ-साथ पुलिस महकमे पर भी शराब दुकानों को रात आठ बजे बंद करवाने की जिम्मेदारी है। लेकिन जब जिम्मेदार ही शराब दुकानों से मुफ्त में शराब की बोतलें लेंगे, तो ये दुकानें रात आठ बजे कैसे बंद होंगी?

आमतौर पर शराब दुकान के बाहर महफिल जमाकर शराब पीने वालों पर पुलिस कार्रवाई करती है, यहां तक कि गिरफ्तारी तक होती है। लेकिन कांस्टेबल करण मीणा ने खुद ठेके के बाहर दोस्तों संग जाम छलकाकर न केवल खाकी की गरिमा को तार-तार किया बल्कि नियमों का भी उल्लंघन किया। ऐसे में केवल जांच बिठाना समझ से परे है।

युवकों को थाने ले जाकर मारपीट करना कितना सही?

कांस्टेबल करण मीणा ने दो युवकों को जबरन पुलिस जीप में बिठाकर थाने ले जाने के बाद उनके साथ गाली-गलौच व मारपीट की। अगर वे युवक अपराधी थे, तो उनके खिलाफ मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया? अगर वे निर्दोष थे, तो उन्हें थाने में क्यों लाया गया?

जबरन शराब पिलाना मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं?

जैसा कि पीड़ित पक्ष ने आरोप लगाया और वीडियो में भी नजर आ रहा है कि कांस्टेबल करण मीणा न केवल खुद शराब पी रहा था, बल्कि अन्य लोगों को भी जबरन शराब पीने के लिए मजबूर कर रहा था। यह स्पष्ट रूप से मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

पुलिस जीप में आए अन्य पुलिसकर्मी दोषी नहीं?

जब कांस्टेबल करण मीणा ने युवकों को थाने ले जाने के लिए पुलिस जीप मंगवाई, तो जीप में सवार अन्य पुलिसकर्मी क्या दोषी नहीं हैं? क्या उनकी कोई जांच नहीं होनी चाहिए?

रेंज आईजी की नजरों से क्यों बचा मामला?

मंगलवार को सिरोही जिले के माउंट आबू में अपराधों की रोकथाम को लेकर पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) ने अधिकारियों और जवानों की बैठक ली थी। इस बैठक में बेहतर कार्य करने वाले पुलिसकर्मियों को प्रोत्साहित किया गया, लेकिन कांस्टेबल करण मीणा द्वारा किए गए अनुशासनहीन कृत्यों पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। सोमवार को यह खबर डिजिटल मीडिया में चली और मंगलवार को कई समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई, लेकिन इसके बावजूद आईजी का ध्यान इस ओर न जाना कई सवाल खड़े करता है।

थानाधिकारी बोले – 15 मार्च को करण मीणा था गैरहाजिर!

थानाधिकारी टीकमाराम से जब इस मामले पर बात की गई, तो उन्होंने बताया कि 15 मार्च को कांस्टेबल करण मीणा ड्यूटी से गैरहाजिर था। ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि जब वह ड्यूटी पर नहीं था, तो उसने युवकों को थाने लाकर गाली-गलौच और मारपीट करने का अधिकार किसने दिया?

सीसीटीवी से होगा बड़ा खुलासा!

थाने में लगे सीसीटीवी कैमरों में इस पूरे घटनाक्रम का रिकॉर्ड होना तय है। कांस्टेबल करण मीणा के बुलावे पर जो पुलिसकर्मी युवकों को जबरन थाने लाए थे, उनकी भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

“लाइन हाजिर” होने का क्या मतलब होता है?

राजस्थान पुलिस सेवा में जब किसी कार्मिक पर अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार, लापरवाही या अन्य गंभीर आरोप लगते हैं, तो उसे “लाइन हाजिर” किया जाता है। इसका मतलब है कि संबंधित पुलिसकर्मी को थाने से हटाकर पुलिस मुख्यालय (पुलिस लाइन) भेज दिया जाता है, जहां उसे किसी भी तरह की महत्वपूर्ण ड्यूटी नहीं सौंपी जाती।

“लाइन हाजिर” होना एक तरह से बड़ी बेइज्जती मानी जाती है। जब तक जांच पूरी नहीं होती और आरोपों से क्लीन चिट नहीं मिल जाती, तब तक पुलिसकर्मी को कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाती। पुलिस विभाग में “लाइन हाजिर” को अनुशासनात्मक कार्रवाई के रूप में देखा जाता है, जिससे कोई भी पुलिसकर्मी बचना चाहता है।

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